राजधानी के गोमती नगर विस्तार की आलीशान स्काईलाइन के बीच ‘पार्थ अर्का’ की अधबनी इमारतें आज लखनऊ के प्रशासनिक तंत्र की विफलता का सबसे बड़ा विज्ञापन बन चुकी हैं। यह सिर्फ एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट का फेल होना नहीं है, बल्कि सैकड़ों परिवारों के उस भरोसे की ‘संस्थागत हत्या’ है, जो उन्होंने सरकार और कानून पर किया था।
बिल्डर की अय्याशी, जनता की तबाही
पिछले दस वर्षों से ‘पार्थ अर्का’ के आवंटियों के लिए हर सुबह बैंक का ‘EMI अलर्ट’ और महीने का ‘मकान किराया’ काल बनकर आता है। बिल्डर ने आधुनिक और प्रीमियम आवास का सपना दिखाकर जिस पैसे को जुटाया, आवंटियों को प्रबल आशंका है कि उसे अवैध रूप से दूसरे धंधों में ‘डाइवर्ट’ (Siphoning of funds) कर दिया गया है। ‘लखनऊ पार्थ अर्का आवंटी एवं रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन’ ने अब आर-पार की जंग छेड़ते हुए यूपी रेरा से धारा 35 के तहत ‘फॉरेंसिक ऑडिट’ की मांग की है, ताकि यह साफ हो सके कि जनता का पैसा आखिर किस ‘काली तिजोरी’ में दफन है।
मुख्यमंत्री का नाम, पर अफसरों का ‘काम’ शून्य
पीड़ित आवंटियों ने जब मुख्यमंत्री के ‘जनता दर्शन’ में अपनी गुहार लगाई, तो उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखी थी। मुख्यमंत्री ने दोषियों पर कठोर कार्रवाई का सख्त निर्देश दिया था। लेकिन शासन के गलियारों में बैठे कुछ ‘सफेदपोशों’ और कछुआ गति से चलने वाले अधिकारियों ने इस संवेदनशील मुद्दे को फाइलों के बोझ तले दबा दिया है। आज आवंटी पूछ रहे हैं “क्या मुख्यमंत्री के आदेशों की अहमियत इन बिल्डरों के रसूख से कम है?”
प्रशासनिक ‘शतरंज’ का शिकार होता आवंटी
रेरा के पास मामले लंबित हैं, आदेश पारित होते हैं, लेकिन जमीन पर एक ईंट नहीं हिलती। प्रशासनिक तंत्र की इस ‘रहस्यमयी’ सुस्ती ने बिल्डर को बेखौफ बना दिया है। आवंटियों का आरोप है कि प्रशासन केवल तारीखों का खेल खेल रहा है, जबकि आवंटी आर्थिक रूप से खोखले और मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं।
हमारी मुख्य मांगें :
फॉरेंसिक जांच: तत्काल प्रोजेक्ट का फॉरेंसिक ऑडिट हो ताकि ‘फंड हेराफेरी’ का पर्दाफाश हो।
कठोर दंडात्मक कार्रवाई: वादाखिलाफी करने वाले बिल्डर की संपत्तियां कुर्क कर प्रोजेक्ट को पूरा किया जाए।
EMI से राहत: जब तक पजेशन न मिले, बैंकों को ब्याज वसूली रोकने का निर्देश दिया जाए।
UPRERA की जवाबदेही: रेरा अपने आदेशों का पालन सुनिश्चित कराए, न कि केवल कागज काले करे।
“पार्थ अर्का के आवंटियों का सब्र अब जवाब दे रहा है। यह मामला सिर्फ ईंट-गारे का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। अगर आज इन परिवारों को न्याय नहीं मिला, तो भविष्य में कोई भी मध्यमवर्गीय व्यक्ति निवेश करने से पहले सौ बार डरेगा।”
